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पर्यूषण पर्व का हुआ दिव्य शंखनादश्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ मंदिर से शुभारंभ अवसर पर निकाली गई पच्चखावनी की शोभा यात्रा

पर्यूषण पर्व का हुआ दिव्य शंखनाद
श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ मंदिर से शुभारंभ अवसर पर निकाली गई पच्चखावनी की शोभा यात्रा आठ दिनो तक चलेगा त्याग, भक्ति,उपासना एवं सत्संग का भव्य आयोजन
पर्वाधिराज पर्युषण में होता है पुण्य का पोषण तथा पाप का शोषण - राजरत्नाश्रीजी

देवास। पर्वाधिराज श्री पर्युषण महापर्व का आज भारत भर में मंगलमय शुभारंभ हुआ है। इसी के साथ श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ मंदिर तुकोगंज रोड पर पर्युषण के शुभारंभ अवसर पर पूज्य साध्वीजी राजरत्ना श्रीजी एवं रिद्धिनिधिजी ने कहा कि पर्युषण के अंतर्गत पुण्य का पोषण एवं पाप का शोषण होता है। इस पर्व के अंतर्गत पांच कर्तव्यो का निर्वाहन किया जाता है ये कर्तव्य है- अहिंसा पालन, साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, अठ्ठमतप, चैत्यपरिपाटी। अहिंसा इस पर्व का प्राण तत्व है। जैन जगत के इतिहास में इस अहिंसा का पालन करके असंख्य जीवात्मा मोक्षगामी बनी है। साधर्मिक याने सहधर्मी की भक्ति करना हमारा प्रथम कर्तव्य है। यदि हम सक्षम है  तो हमारे सहधर्मी की कठिनाईयो को अवश्य दूर करना चाहिए। क्षमापना हमारे मित्रो एवं शत्रुओ सभी से करना होगी तब ही पर्व की सार्थकता बनेगी। अठ्म तप के अंतर्गत पर्यूषण के दौरान तीन उपवास किए जाते हैं और चैत्य परिपाटी करके सभी जिन मंदिरों के दर्शन एवं स्पर्शना की जाती है। आपने कहा कि जिस प्रकार हजारो किमी लम्बी रेल की पटरी में से यदि कुछ सेन्टीमीटर पटरी हटा दी जावे तो भयावह दुर्घटना हो सकती है, उसी प्रकार इन पांचो कर्तव्यो में से एक का भी पालन नहीं करेंगे तो यह पर्व हमारे लिए लाभदायक नहीं बन सकेगा।
आपने आगे कहा कि जैन जगत में चार अधिराज है-पर्वाधिराज, ग्रंथाधिराज, तीर्थाधिराज, मंत्राधिराज। पर्युषण सभी पर्वो का राजा है जिसकी आज से आराधना प्रारंभ हुई है। ग्रंथाधिराज कल्पसूत्र है जिसका वांचन इस पर्व के  अंतर्गत होगा। तीर्थाधिराज श्री शत्रुंजय तीर्थ की भावयात्रा भी इसी तारतम्य में संपादित होगी। मंत्राधिराज नवकार महामंत्र की आराधना भी पर्युषण के अंतर्गत की जावेगी। पर्व दो प्रकार के होते है- लौकिक एवं लोकोत्तर । लौकिक पर्व वह है जिसमें शरीर चुस्त एवं आत्मा सुस्त बनती है। इन पर्वो में खाना, पीना, मिलना, मौज-मस्ती एवं भौतिक सामग्रियो की चकाचौंध रहती है। लोकोत्तर पर्व जैसे पर्युषण में आत्मा चुस्त और शरीर सुस्त बनता है। पर्युषण पर्व में जगत की सभी विशेषताओ जैसे त्याग, वैराग्य, प्रभु भक्ति, सुमीरण, ध्यान, गुरूभक्ति, गंभीरता, उदारता, सहिष्णुता, क्षमापना आदि का समावेष रहता है। इसीलिए इस पर्व को पर्वाधिराज की उपाधि दी है।
 प्रवक्ता विजय जैन ने बताया कि आज पर्युषण के प्रथम दिवस पर प्रात सिद्धितप के तपस्वियों की पच्चखावनी की शोभायात्रा निकाली गई। प्रात: 7.15 बजे साध्वी मंडल के साथ सिद्धि तप के तपस्वी एवं समाज के सभी महिला पुरुष सम्मिलित रूप से अरुण कुमार सुजानमल मूणत के सुपर मार्केट स्थित निवास पर एकत्रित हुए । वहां से गुरूदेव के पगलिया एवं पाद प्रक्षालन द्वारा तपस्वी सम्मान करने के पश्चात गाजे-बाजे के साथ मंदिर पर पदार्पण हुआ। दोपहर 2 बजे नवपद जी पूजन का आयोजन धर्मचंद डोसी द्वारा किया गया। रात्रि महाआरती पश्चात भक्ति भावना के विशिष्ट कार्यक्रम हुए।
आगामी कार्यक्रम
आगामी कार्यक्रम के अंतर्गत 25 अगस्त को प्रात 5.45 बजे प्रतिक्रमण, 8 बजे सामूहिक स्नात्र महोत्सव,9.15 बजे प्रवचन, दोपहर में नवपद पूजन छगनलाल रखबचंद जैन त्रिमूर्ति परिवार द्वारा होगा एवं रात्रि महाआरती तथा भक्ति भावना के कार्यक्रम आयोजित होंगे।

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