पाप करना छोड़ दो पुण्य करने की जरूरत नहीं पड़ेगी - महामंडलेश्वर भास्करानंद जी
देवास। अधर्म के द्वारा अर्जित संपत्ति शांति का नाश करती है पवित्रता से कमाए धन धर्म में लगाने से कलयुग का क्षीण होता है। भगवान को भोग लगने वाला भोजन प्रसाद हो जाता है उसमें पवित्र गुण विकसित होने के कारण वो तन मन को शुद्ध करते आप में श्रेष्ठ आचारों का समावेश करता है ।
हम अच्छे गुरु की तलाश में रहते है किंतु जब अच्छे शिष्य बन जाओगे तो तुम्हे अच्छा गुरु नारायण के रूप मेल जायेंगे। परीक्षित के मोक्ष मार्ग प्रशस्त के लिए शुकदेव मुनि जैसे संत का मिलना ही नारायण की कृपा थी परीक्षित अर्थात जिसके चारों ओर परीक्षा परीक्षा है वो हर इंसान परीक्षित है। बिना गुरु के न तो हरि कृपा प्राप्त होती है नहीं मोक्ष का रास्ता दिखाई देता है। भक्ति की प्राप्ति के तीन चरण है श्रवण, कीर्तन और ध्यान। जगत और जगदीश दोनों की महिमा कानों से मिलती है। शास्त्र को सुनोगे तो पता चलेगा कि ये संसार क्या है। भजन से ईश्वरीय संबंध बनता है। इसलिए संसार की बजाय ईश्वर के रिश्ता जोड़ने अच्छा है । हरि से जो रिश्ता जोड़ता है हरि उसको हारने नहीं देता है। पाप और पुण्य दोनों का हम चिंतन करते है जैसे गंगा को गंदा करना पाप है तो उसे गंदा नहीं करना पुण्य है। पाप करना छोड़ दो पुण्य करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह आध्यात्मिक विचार चैत्र नवरात्रि पर केला देवी मंदिर में हो रही श्रीमद् भागवत कथा की तीसरे दिन महामंडलेश्वर भास्करानंद जी ने जीवन दर्शन के सूत्रों को व्यक्त करते हुए कहे। कथा में श्रृष्टि निर्माण , सती चरित्र, कपिल अवतार के आध्यात्मिक प्रसंगों का सुंदर वर्णन किया। व्यास पीठ की पूजा मन्नूलाल गर्ग, दीपक गर्ग, अनामिका गर्ग एवं परिवार में की आरती में विशेष रूप से अश्विन गोयल इंदौर हरीश, मंगल इंदौर,कथा संयोजक रायसिंह सेंधव,समिति अध्यक्ष दुर्गेश अग्रवाल,राजेश यादव रजिस्टर जयसिंह गावड़े, राकेश जी काला पीपल, प्रेम कुमार अग्रवाल राजेश अग्रवाल,ओम प्रकाश अग्रवाल जिंसी वाले योगेश बंसल ,हरीश मंगल, अमित अग्रवाल,चंद्रपाल सिंह सोलंकी नारायण जी मंगल इंदौर सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।
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