सांस से ही सब देहों की शोभा है, सांस निकल जाने पर शरीर मुर्दा हो जाता है। सद्गुरु मंगल नाम साहेब,,,
सुरगुरु स्वांस ही सर्व सुखों का सागर है, सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। सब देह का संचालक सुरगुरु( सांस) ही है। सुरगुरु ही सर्व सुखों का सागर है। जितनी भी देह है सब में व्यापक रूप से मौजूद है। सब देहों में सुरगुरु ही सुशोभित है। सांस से ही सब देहों की शोभा है। सांस निकलने पर शरीर मुर्दा हो जाता है। सब में उसका रंग है। लेकिन दिखाई नहीं देता। क्योंकि वह विदेही है। जिसकी देह नही है। सिर्फ अनुभूति की जा सकती है। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर प्रार्थना स्थली चूना खदान बालगढ़ में आयोजित गुरु शिष्य संवाद, गुरुवाणी पाठ में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि मानव अपने शौर्य, पराक्रम, पद प्रतिष्ठा के लिए धन की उपासना करता है। जो नाशवान है। उपासना उसकी करो जो कभी खंडित नहीं होता। जो सब देहों में अखंड है। जो व्यापक हैं ओर अजर अमर है। धन दौलत पद पदार्थ सब समाप्त हो जाएंगे। लेकिन स्वांस कभी खंडित नहीं होती। लोग इतनी ऊंचाइयों पर प्राण की उपासना करते हैं, कि तुम तो मेरे प्राण प्रिय हो। क्योंकि प्राण ही अखंड है। मृत्यु तो केवल शरीर की होती है प्राण तो अखंड और अजर अमर है। जो कपड़े चमड़े पद पदार्थ में भटक रहे हैं। वह सुरगुरु तक पहुंच नहीं पाते हैं। इसलिए संसार में भटक रहे हैं। प्राण ही सब शरीरों का स्वामी है। इसलिए लोग कहते हैं कि तुम तो मेरे प्राण से भी प्रिय हो। जो श्वास का उपासक होता है ,सुरगुरु का उपासक होता है वही पहुंच पाता है। बाकी सब संसार में भटक रहे। भगवान राम के कार्य सब पवन पुत्र ने ही संवारे हैं। रामकाज करिए बिना मोहे कहां विश्राम। साहब कहते हैं कि राम का ही कार्य करने के लिए इस शरीर की धारणा की है। उसमें दया धर्म को ही सबसे ऊंचाइयों पर ले जाना है। इस सांसारिक जगत में दया और धर्म को कायम करने पर ही सत्य और विश्वास कायम होगा। आगे कहा कि कोई नया है, ना कोई पुराना होता है। आज हता सो अब है, संतों, फेर फार कछु नाही। भूत भरम में भटको मत, सुरगुरु हमारा अनंत काल से एक है। तुम कपड़े, चमड़े बदल लेते हो लेकिन शुरू गुरु कभी नहीं बदलता। जैसे किसी के पद से हटने पर वर्दी उतर जाती है। वैसे ही सांस निकल जाने पर शरीर मुर्दा हो जाता है। इसलिए सुरगुरु की ही उपासना करो। जो सदा तुम्हारे साथ है। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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