मालवी जाजम पर बिखरे मालवा के कई रंग
मालवा का लोक जीवन हुआ जीवंत,,25 से अधिक ठेठ देसी व्यंजनों को बनाना सीखाया मालवी परम्परागत लोकगीतों पर झूम उठे श्रोता
देवास। मालवा अँचल की विविधवर्णी परम्पराओं, भौगोलिक पहचान, तासीर, मौसम, संस्कृति, खान-पान, और सामाजिक व्यवहार के रूप में पीढ़ियों से एक जैसे रहे हैं। ये सब पीढ़ियों के जीवनानुभव से उपजे लोक का संचित ज्ञान था, जिसे हम तेज़ी से खत्म करते जा रहे हैं।
देवास में मंगलवार को आयोजित मालवी जाजम में ये बातें मालवा के अध्येता वक्ताओं ने कही। विभिन्न सत्रों में सुबह से शाम तक रोचक बातचीत हुई। इससे पूर्व जीएसआईटीएस इंदौर के निदेशक नितेश पुरोहित, मप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद भोपाल के विवस्मान हेबालकर, प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी उज्जैन ने शुभारंभ किया। वरिष्ठ सामाजिक विज्ञानी डॉ सुनील चतुर्वेदी ने इस दो दिनी महती आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन मनीष शर्मा ने करते हुए इसकी पूर्व पीठिका प्रस्तुत की। रजनीश पोरवाल ने स्वागत भाषण दिया।
मालवा का लोक जीवन के पहले सत्र में संस्कृति, लोक साहित्य, लोक पर्व, पहनावा, खान-पान, आबो-हवा, भूगोल, हवा, पानी में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए समूह चर्चा में लगभग 50 प्रतिभगियों ने अपनी बात रखी।
25 से ज्यादा मालवी व्यंजन बनाना सीखाए
मालवी जन के ठेठ देसी स्वाद को याद करते हुए 25 से ज़्यादा ऐसे व्यंजनों को बनाना सीखाया गया जो अब लगभग प्रचलन से बाहर हो चुके हैं। मालवी मिठास के भावेश कानूनगो ने रसावल के ज़रिए घुघरी, लाप्सी, सीरो, सुनसुनी, नुक्ती, राखोडिया लड्डू आदि व्यंजनों पर बात की तो सभागार में उपस्थित श्रोताओं की जीभ पर बरसों पुराना स्वाद लौट आया। चयन कानूनगो ने सत्र को रोचक ढंग से फेसिटिलेट किया।
छाया चित्र और कला प्रदर्शनी में झलका मालवा का सौंदर्य
आयोजन स्थल पर प्रदर्शित मालवा के वरिष्ठ छायाचित्रकार कैलाश सोनी, बंशीलाल परमार, सुधीर महाजन और प्रत्युष वैद्य के छायाचित्रों में मालवा का जन-जीवन धड़कता हुआ सा लगा। इसमें देखकर लगा कि हमने इधर के 30-40 सालों में नए चलन में आकर मालवा से क्या-क्या खो दिया है।
इसी प्रकार कला प्रदर्शनी में वंदना शर्मा, कुसुम वागड़े, छाया कानूनगो, शांतनु बेहरे, शर्मिला ठाकुर तथा मीनाक्षी दुबे की परंपरागत कृतियों ने मालवा की गौरवशाली विभिन्न पर्वों, अवसरों पर बनने वाले मांडणा, चित्रावण और संजा आदि को रेखांकित किया।
मालवी लोकगीतों ने बाँधा समां
गीता बाई पराग और उनकी मण्डली ने पीढ़ियों से गूँजने वाले परम्परागत सुमधुर मालवी लोकगीतों की प्रस्तुति दी तो समूचा सभागार तालियों से गूँज उठा। सिंगाराम पराग, तनु पराग, अंकित मालवीय, ललिता सूर्यवंशी आदि संगत कलाकार थे।
बुधवार को भी होंगे कई सत्र
दो दिनीं आयोजन में बुधवार को भी खेड़ापति होटल में कई सत्र होंगे, जिनमें मालवा के खेत-खलिहान की पीढ़ियों पुरानी शैली तेज़ी में आए बदलावों को पहचान कर नए तौर तरीकों के नुकसान पर भी बात होगी। इसके साथ मालवा की चिकित्सा, सेहत और मालवा की जैव संपदा पर भी महत्त्वपूर्ण सत्र होंगे।
आयोजन में बड़ी संख्या में उज्जैन, आगर, रतलाम, देवास आदि जिलों के गणमान्यजन तथा ग्रामीणजन उपस्थित थे।

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