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मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं, फल परम सत्ता के हाथ में है-आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत

मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं, फल परम सत्ता के हाथ में है-आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत
देवास। प्रकृति की सुरम्य गोद में अवस्थित जमालपुर बिहार के कोलकाली आध्यात्मिक केंद्र “आनन्द सम्भूति मास्टर यूनिट, अमझर” के कोलकाली मैदान में 13 से 15 मार्च 2026 तक आयोजित भव्य धर्म महासम्मेलन के द्वितीय दिवस का कार्यक्रम आनंद मार्ग प्रचारक संघ के पुरोधा प्रमुख श्रद्धेय आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने एक अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायी विषय पर प्रवचन दिया, जिसमें उन्होंने प्रपत्ति, विप्रपत्ति और अप्रपत्ति के दार्शनिक पक्ष को स्पष्ट किया।
प्रपत्ति का दार्शनिक आधार मानव बुद्धि और अंतर्ज्ञान की भूमिका
पुरोधा प्रमुख ने कहा कि मानव बुद्धि और अंतर्ज्ञान के क्षेत्र में एक अत्यंत सुंदर विचार रहा है वह है प्रपत्ति का विचार। इसी प्रपत्ति के आलोक में व्रज कृष्ण और पार्थसारथि कृष्ण की भूमिकाओं का विश्लेषण किया जा सकता है।
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में प्रपत्तिवाद का विशेष महत्व है। फिलोसफी एक लैटिन शब्द है, जिसका अरबी रूप फलसफा तथा संस्कृत शब्द दर्शन है। दर्शन वास्तव में कर्म प्रवाह का सैद्धांतिक पक्ष है। मनुष्य को क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए और क्यों करना चाहिएकृइन प्रश्नों का समाधान दर्शन देता है।
भगवान शिव और आध्यात्मिक साधना का व्यावहारिक मार्ग
आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने कहा कि प्राचीन भारतीय इतिहास के अनुसार भगवान सदाशिव का अवतरण लगभग सात हजार वर्ष पूर्व हुआ था। उस समय मानव समाज की बौद्धिक क्षमता अधिक विकसित नहीं थी, इसलिए दार्शनिक चर्चाएँ लोगों के लिए उपयोगी नहीं थीं।
भगवान शिव ने उस समय मानव समाज को आध्यात्मिकता के व्यावहारिक मार्ग की ओर प्रेरित किया। उन्होंने लोगों को तंत्र साधना सिखाई, जो आध्यात्मिकता का प्रयोगात्मक पक्ष है। शिव ने तांडव नृत्य का प्रचार किया, जबकि पार्वती ने समाज को ललित और कोमल नृत्य की शिक्षा दी।
इसी प्रकार शिव ने महर्षि धन्वंतरि को वैद्यक शास्त्र का ज्ञान दिया तथा भरत मुनि को नृत्य, गीत और वाद्य के माध्यम से संगीत विज्ञान का शिक्षण कराया। इस प्रकार उन्होंने मानव प्रतिभा के अनेक द्वार खोल दिए, किंतु दर्शन का प्रतिपादन नहीं किया। उन्होंने ऐसे तथाकथित दार्शनिकों को “लोकव्यामोहकारक” कहा, जो समाज को भ्रमित करते थे।
महर्षि कपिल और सांख्य दर्शन का उदय
भगवान शिव के बहुत बाद महर्षि कपिल का जन्म हुआ, जिन्हें विश्व का प्रथम मान्य दार्शनिक माना जाता है। उनका जन्म वर्तमान पश्चिम बंगाल के पुरुलिया क्षेत्र के समीप हुआ था और उन्होंने गंगासागर में साधना की।
महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया और सृष्टि के विकास को चौबीस तत्त्वों के आधार पर समझाया। चूँकि उन्होंने तत्त्वों की संख्या चौबीस बताई, इसलिए उनके दर्शन को सांख्य कहा गया।
हालाँकि कपिल ने सृष्टि के सर्वाेच्च कारण के रूप में परम सत्ता को स्वीकार किया, परंतु उन्होंने उसके स्वरूप का विस्तार से वर्णन नहीं किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि इस सृष्टि का एक सर्वाेच्च कारण अवश्य है, जिसे वे “जन्य ईश्वर” कहते हैं।
 प्रपत्ति, विप्रपत्ति और अप्रपत्ति के दार्शनिक मत
कपिल के विचारों के बाद एक नया दार्शनिक दृष्टिकोण विकसित हुआ-प्रपत्तिवाद। प्रपत्ति का अर्थ है पूर्ण समर्पण। इस मत के अनुसार संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह परम पुरुष की इच्छा से ही हो रहा है। साधक का भाव होना चाहिए-
“हे प्रभु! आपकी इच्छा ही पूर्ण हो।
मैं तो केवल एक साधन हूँ, आप जैसे चाहें वैसे उपयोग करें।”
इसके विपरीत जो विचार प्रपत्ति का विरोध करता है उसे विप्रपत्ति कहा गया।
और जो न समर्थन करता है न विरोधकृवह अप्रपत्ति कहलाता है।
शैव साधक, जिन्हें भगवान शिव ने दर्शन की बहस से दूर रहने को कहा था, वे अप्रपत्तिवादी माने जाते थे। उक्त जानकारी देते हुए आनंद मार्ग प्रचारक संघ देवास के हेमेन्द्र निगम काकू ने  बताया कि कार्यक्रम में आध्यात्मिक प्रभात संगीत पर आधारित भक्ति गीत पर बच्चों द्वारा शानदार प्रस्तुति दी।कार्यक्रम में आचार्य नभातीतानंद अवधूत,आचार्य जगत्मानंद अवधूत,आचार्य पुष्पेन्द्रानंद अवधूत,आचार्य पुण्येशानंद अवधूत,आचार्य सुभद्रानंद अवधूत भी उपस्थित रहे।

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