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व्यास पूजन पर द हिमालय विद्यालय में गुरु-शिष्य परंपरा का भव्य आयोजन,,विशेष व्याख्यान, प्रेरक संवाद एवं रोचक क्विज के माध्यम से विद्यार्थियों ने जाना गुरु के सम्मान, गौरव और प्रतिष्ठा का महत्व

व्यास पूजन पर द हिमालय विद्यालय में गुरु-शिष्य परंपरा का भव्य आयोजन,,

विशेष व्याख्यान, प्रेरक संवाद एवं रोचक क्विज के माध्यम से विद्यार्थियों ने जाना गुरु के सम्मान, गौरव और प्रतिष्ठा का महत्व
देवास 18 अगस्त 26 भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। गुरु केवल ज्ञान प्रदान करने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व, संस्कार, चरित्र और जीवन-दृष्टि का निर्माता होता है। इसी सनातन भाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा गुरु-शिष्य परंपरा की गौरवशाली विरासत को पुनः सशक्त करने के उद्देश्य से भारतीय शिक्षण मंडल, मालवा प्रांत एवं द हिमालय विद्यालय, देवास के संयुक्त तत्वावधान में व्यास पूजन के पावन अवसर पर “गुरु-शिष्य परंपरा एवं गुरु के सम्मान, गौरव और प्रतिष्ठा” विषय पर एक भव्य, प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में शिक्षा, संस्कृति एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी प्रतिष्ठित हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की महत्ता को और बढ़ा दिया। संपूर्ण कार्यक्रम भारतीय संस्कृति, गुरु के प्रति श्रद्धा, विद्यार्थियों में श्रेष्ठ संस्कारों के निर्माण तथा मूल्य आधारित शिक्षा के संदेश से ओत-प्रोत रहा।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता भारतीय शिक्षण मंडल की अध्यक्ष डॉ. माया इंगले ने गुरु-शिष्य परंपरा के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वर्तमान संदर्भों पर अत्यंत प्रभावशाली उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु केवल पुस्तकीय ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह शिष्य के अंतःकरण को प्रकाशित करने वाला, उसके व्यक्तित्व को दिशा देने वाला और जीवन के कठिन मार्ग पर सही पथ दिखाने वाला सच्चा मार्गदर्शक होता है।
डॉ. इंगले ने कहा कि भारत की शिक्षा परंपरा का आधार केवल सूचना या परीक्षा नहीं रहा, बल्कि ज्ञान, चरित्र, संस्कार और राष्ट्रबोध रहा है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था में गुरु अपने शिष्य को जीवन जीने की कला सिखाता था। बदलते समय में शिक्षण के साधन और तकनीक अवश्य बदल गए हैं, किंतु गुरु और शिष्य के मध्य विश्वास, आत्मीयता, अनुशासन और सम्मान का रिश्ता आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने गुरुजनों के प्रति केवल औपचारिक सम्मान न रखें, बल्कि उनके मार्गदर्शन को जीवन में आत्मसात करें। उन्होंने कहा कि जिस समाज में गुरु का सम्मान होता है, उस समाज में ज्ञान, संस्कार और श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण स्वाभाविक रूप से होता है। गुरु का सम्मान वास्तव में ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्र की प्रतिष्ठा का सम्मान है।

विद्यार्थियों के साथ रोचक क्विज बना कार्यक्रम का विशेष आकर्षण
कार्यक्रम का सबसे रोचक एवं विशेष आकर्षण डॉ. माया इंगले द्वारा विद्यार्थियों के साथ आयोजित प्रश्नोत्तरी (क्विज) गतिविधि रही। इस गतिविधि में विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति, महर्षि वेदव्यास, गुरु-शिष्य परंपरा, जीवन मूल्यों एवं नैतिक शिक्षा से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे गए।
विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्नोत्तरी को केवल ज्ञान की परीक्षा न बनाकर संवाद और आनंद के माध्यम से विद्यार्थियों के भीतर भारतीय संस्कृति के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने का प्रयास किया गया। डॉ. इंगले ने प्रत्येक उत्तर के साथ उसका सांस्कृतिक और जीवनोपयोगी पक्ष भी सरल भाषा में समझाया। इससे पूरा विद्यालय परिसर उत्साह, जिज्ञासा और ज्ञान के वातावरण से भर उठा।
उन्होंने विद्यार्थियों को संदेश दिया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना या सफल करियर बनाना नहीं, बल्कि अच्छा मनुष्य बनना है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी यदि अपने माता-पिता, गुरुजनों और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का भाव रखें तो वे जीवन में बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

अनुशासन और निरंतरता सफलता का आधार – राजश्री काले

कार्यक्रम में राधाबाई स्कूल की पूर्व प्राचार्या श्रीमती राजश्री काले ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जीवन में अनुशासन, समयबद्धता और निरंतरता का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी विद्यार्थी की वास्तविक सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम, अनुशासन और अच्छे आचरण से निर्मित होती है।
उन्होंने महर्षि वेदव्यास के जीवन और भारतीय ज्ञान परंपरा में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि वेदव्यास जी ने भारतीय समाज को अमूल्य ज्ञान-संपदा प्रदान की। उनकी ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए व्यास पूजन की परंपरा हमारे समाज में विशेष स्थान रखती है।
श्रीमती काले ने कहा कि बच्चों को अपने दैनिक जीवन में अपनी वाणी, व्यवहार, अध्ययन, समय और कर्तव्यों के प्रति निरंतरता बनाए रखनी चाहिए। शिक्षा तभी सार्थक है जब वह विद्यार्थी के आचरण में दिखाई दे। उन्होंने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और पारिवारिक संस्कारों को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
  उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भी भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, नैतिक शिक्षा, कौशल, संस्कार और जीवन मूल्यों को विशेष महत्व दिया जा रहा है। नई पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान के साथ अपनी जड़ों और संस्कृति से भी जुड़ा रहना आवश्यक है।

“माँ ही जीवन की प्रथम गुरु और सबसे अच्छी मित्र” – पूर्वा दीक्षित

सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय पूर्वा दीक्षित मैम ने विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद करते हुए परिवार, संस्कार, व्यवहारिक ज्ञान, सकारात्मक सोच एवं जीवनशैली से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे के जीवन की पहली गुरु उसकी माँ होती है। माँ ही बच्चे को बोलना, चलना, संस्कार, व्यवहार और जीवन के प्रारंभिक मूल्य सिखाती है। इसलिए बच्चों को अपनी माँ को केवल अभिभावक नहीं, बल्कि अपनी सबसे अच्छी मित्र भी मानना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे जीवन की छोटी-बड़ी प्रत्येक बात, समस्या, उलझन या चिंता अपने माता-पिता विशेषकर अपनी माँ से साझा करें। परिवार से संवाद रखने वाला बच्चा जीवन की चुनौतियों का अधिक आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकता है।
  पूर्वा दीक्षित ने बच्चों को दैनिक जीवन में स्वास्थ्यप्रद भोजन अपनाने, प्राकृतिक वस्तुओं का अधिक उपयोग करने, अनावश्यक रसायनों से दूरी रखने तथा प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा भी दी। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त करने के लिए शरीर, मन, विचार और व्यवहार—चारों का स्वस्थ एवं सकारात्मक होना आवश्यक है।
गुरु के चरणों में नमन कर लिया आशीर्वाद
कार्यक्रम के समापन अवसर पर विद्यार्थियों ने अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करते हुए नमन किया तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर विद्यालय परिसर में गुरु और शिष्य के बीच आत्मीयता एवं सम्मान का अत्यंत भावपूर्ण वातावरण निर्मित हुआ।
कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को यह संदेश दिया गया कि गुरु केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और असत्य से सत्य की ओर ले जाने वाली दिव्य शक्ति है। गुरु का मार्गदर्शन विद्यार्थी के जीवन को दिशा देता है और उसके भीतर छिपी प्रतिभा को राष्ट्र एवं समाज के उपयोग में लाने योग्य बनाता है।
आयोजन ने यह भी संदेश दिया कि आधुनिक शिक्षा के साथ यदि भारतीय संस्कृति, गुरु के प्रति श्रद्धा, माता-पिता के प्रति सम्मान, अनुशासन, नैतिकता एवं राष्ट्रबोध को जोड़ा जाए तो शिक्षा सही अर्थों में समाज और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन सकती है।
विद्यालय परिवार ने इस अवसर पर भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की गौरवशाली विरासत को सदैव अक्षुण्ण रखने तथा विद्यार्थियों में गुरुजनों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और संस्कारों की भावना को निरंतर मजबूत करने का संकल्प लिया।
व्यास पूजन का यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम बनकर नहीं रहा, बल्कि विद्यार्थियों के लिए संस्कार, ज्ञान, संवाद, श्रद्धा और भारतीयता का जीवंत पाठ बन गया। कार्यक्रम ने यह सशक्त संदेश दिया कि जिस राष्ट्र में गुरु का सम्मान सुरक्षित है, वहां ज्ञान की ज्योति, संस्कारों की शक्ति और राष्ट्र का भविष्य सदैव उज्ज्वल रहता है।


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