बंदगी तभी कबूल होती है, जब भूखे को भोजन और प्यासे को पानी पिलाया जाए.. सद्गुरु मंगल नाम साहेब,,
भूखे को कुछ देकर जो जय प्राप्त होती है उसे कोई पराजय में नहीं बदल सकता... सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। कबीर पंथ में बंदगी तभी कबूल होती है, जब कोई भूखे को कुछ खिलाता है।जो अपनी बंदगी संसार में जारी रखता है, कबूल करता है तब मालिक के यंहा बंदगी कबूल होगी। चलते-चलते और बिना लिए दिए नहीं। कबीर पंथ की बंदगी अहंकार का त्याग करके भूखे को कुछ खिलाकर प्राप्त करता है। साहब कहते है कि मेटेहूँ काल, जाल बड़ी फंदा। संसार के जितने फंदे हैं, जगत के जितने धर्म नियम है। ऐसे समय में जीव दया और आतम पूजा कहे कबीर कोई देव न दूजा। भूखे को कुछ दीजिए जीवों पर दया कीजिए।भोले भाले लोग हैं, समझते नहीं क्या चीज है। तभी तो भूखे मर रहे है। आदमी अगर समझ जाए तो भूखा कहां से रहेगा। बांट के खाओगे तो कोई भूखा नहीं रहेगा। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली चूना खदान बालगढ़ में आयोजित गुरु शिष्य संवाद, गुरुवाणी में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि जो दूसरों को बांटकर खाएगा वह भूखा रहेगा क्या। भूखे को भोजन और प्यासे को पानी पिलाकर ही बंदगी कबूल होगी। बंदगी तृप्ति का नाम है। आपके अंदर ज़ब बंदगी आ जाए तो तृप्ति आ जाएगी। जब वह नाम ह्रदय बसे, तो सुधा रहे न कोई। जब वह नाम रूपी अमृत अन्न के रूप में आपको प्राप्त होता है, तो आपकी सुधा यानी भूख शांत हो जाएगी। कबीर पंथ की सबसे पहली रहणी है बंदे की बंदगी। भूखे को कुछ देकर खाता है उसकी बंदगी कबूल होती है। जब पेट भर जाता है, तो उसकी तृप्ती उसका विश्वास अटल हो जाता है। चाह गई चिंता गई, फिर उसकी चाह चिंता खत्म हो जाती है। उन्होने आगे कहा कि किसी का छीनकर किसी को धोखा देकर जय प्राप्त करते हो वह जय, जय नहीं है। किसी भी दिन मौका देखकर आपकी जय पराजय में बदल देगा। लेकिन भूखे को कुछ खिलाकर जो आशीर्वाद निकलता है, जो जय प्राप्त होती है, कि तेरी जय जयकार हो। वह ऐसी जय है, जिसे कोई पराजय में नहीं बदल सकता। जो एक पराजयहीन जय है । इस दौरान सद्गुरु मंगल नाम साहेब कि साध संगत द्वारा आरती व नारियल भेंट कर कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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