हमे हर परिस्थिति में अच्छाई खोजने का अभ्यास करना चाहिए -संत प्रभावती देवी,,
ग्राम भिकुपुरा में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में सतपाल महाराज की शिष्या ने कहादेवास। रोज सुबह या शाम कम से कम आधा घंटा स्वयं को देना चाहिए। मनन, चिंतन व अध्ययन द्वारा अगर हम घर के अंदर अच्छी सोच, वृत्ति व व्यवहार रखते हैं तो हमारे घर का वातावरण सकारात्मक एवं सुखदायी बनता है। घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि उसमें कोई भी प्रवेश करें तो वह मन की शांति महसूस करें।घर का वातावरण हमारे संकल्प व वृत्ति से बनता है। घर हो या बाहर, सब जगह लोग समान है, लेकिन उनकी विचार प्रक्रिया अलग-अलग है, जिससे उन जगहों का वातावरण अलग-अलग हो जाता है। अगर खुद को व बच्चों को शक्तिशाली व प्रतिभाशाली बनाना है एवं दुखदायी स्थिति में भी शांति एवं सुख का अनुभव करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने मन और घर के वातावरण को शांतिपूर्ण, सकारात्मक,शुद्ध व शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। अगर घर में तनाव, क्रोध, दुख या चिंता का वातावरण है तो समझ लीजिए कि बच्चे कमजोर ऊर्जा में बड़े हो रहे हैं। सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा हमारी मन विचार प्रक्रिया से ही सृजित होती है।
उक्त प्रेरणादाई विचार ग्राम भीकूपुरा के समाजसेवी मांगीलाल यादव की धर्मपत्नी शकुंतला बाई की स्मृति में आयोजित रात्रि कालीन सत्संग समारोह में सतपाल महाराज की शिष्या प्रभावती बाई जी ने व्यक्त किये। संत श्री ने भजन -- रे मन ये दो दिन का मेला रहेगा, कायम न जग का झमेला रहेगा... की मधुर प्रस्तुति देते हुए कहा जीवन की सार्थकता इस बात में है कि हम हर परिस्थिति में अच्छाई खोजने का अभ्यास करें। यह दृष्टि हमें नकारात्मकता से ऊपर उठाकर सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ती है। जो व्यक्ति यह कला सीख लेता है, उसके लिए समस्याएं भी अवसर बन जाती है। धार्मिक आडंबरों से अधिक महत्वपूर्ण है आचरण की पवित्रता। यदि वर्षाे की पूजा- अर्चना, प्रवचन और शास्त्र- अध्ययन के बाद भी हमारे व्यवहार में परिवर्तन नहीं आता तो यह आत्म-छल से अधिक कुछ नहीं। सच्ची श्रेष्ठता दूसरों को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि सबके गुणों की सराहना करने में है। प्रशंसा का एक छोटा-सा भाव भी संबंधों में मधुरता और समाज में मैत्री का विस्तार करता है।
उन्होंने आगे कहा जब दृष्टि बाहर की कमियों पर अटक जाती है, तब तब भीतर का दर्पण धुंधला हो जाता है। वास्तविक साधना यह है कि हम स्वयं के अंतर्मन में झांकें,अपनी सीमाओं को पहचाने और उन्हें परिष्कृत करने का सहज जुटाएं। आत्मावलोकन की यह प्रक्रिया ही आत्म विकास का प्रथम सोपान है। जब मैं और तुम की विभाजक रेखा मिटने लगती है, तब एक अद्भुत एकात्मक बोध जन्म लेता है। यह अनुभूति की जो तू है वही मैं हूं, और जो मैं हूं, वही तू है- मानवता की सर्वाेच्च चेतना का परिचायक है। इस स्थिति में मन का द्वैत समाप्त होता है और व्यक्ति अद्वैत के आनंद में स्थित हो जाता है।
इस मौके पर उपस्थित साध्वी नमिता बाई जी ने ज्ञान-भक्ति, वैराग्य से ओतप्रोत मधुर भजन राम गुण गाईले रे, जब लक सुखी शरीर.. की प्रस्तुति देते हुए कहा निमाड़ के संत सिंगाजी महाराज ने जिस आत्मज्ञान को उन्होंने उनके गुरु से साक्षात प्राप्त किया, इस तरह हमें भी वर्तमान समय के तत्वदर्शी सद्गुरु द्वारा अपनी आत्म के कल्याण हेतु अवश्य जानना चाहिए। तभी हमारे द्वारा की जा रही पूजा-अर्चना, व्रत उपवास आदि का हमें सही लाभ मिल पाएगा। श्रद्धांजलि सभा में उपस्थितजनों ने 2 मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की। विश्व शांति की प्रार्थना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।

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