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प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाई प्रेमचंद की 146वीं जयंती,, कालजयी रचनाओं का हुआ वाचन, साहित्य की सामाजिक भूमिका पर हुई चर्चा

प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाई प्रेमचंद की 146वीं जयंती,,

 कालजयी रचनाओं का हुआ वाचन, साहित्य की सामाजिक भूमिका पर हुई चर्चा

देवास। प्रगतिशील लेखक संघ, देवास इकाई द्वारा महान साहित्यकार, कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती श्रद्धा एवं साहित्यिक गरिमा के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत प्रेमचंद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इस अवसर पर उनके साहित्य और सामाजिक योगदान पर विस्तृत चर्चा की गई तथा उनकी कालजयी रचनाओं का वाचन भी हुआ। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक डॉ. प्रकाश कांत सहित उपस्थित साहित्यकारों ने प्रेमचंद के चित्र पर पुष्प अर्पित किए। विजय जोशी ने पंच परमेश्वर का पाठ किया, जबकि डॉ. इक़बाल मोदी ने हरिशंकर परसाई की चर्चित रचना प्रेमचंद के फटे जूते का वाचन किया। वक्ताओं ने कहा कि पंच परमेश्वर तत्कालीन भारत की न्याय व्यवस्था, हिंदू-मुस्लिम भाईचारे तथा मानवीय कमजोरियों—झूठ, छल, कपट, लालच और धोखे—का सशक्त चित्रण करती है। इसमें पंचायत के न्याय को साक्षात परमेश्वर का न्याय बताया गया है। प्रगतिशील लेखक संघ, देवास इकाई के अध्यक्ष कैलाश सिंह राजपूत ने कहा कि वर्ष 1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि "साहित्य का कार्य राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने का है, न कि सत्ता के तलवे चाटने का।" उन्होंने यह भी कहा था कि साहित्य का उद्देश्य लोगों को सुलाना नहीं, बल्कि उन्हें जागृत और बेचैन करना है। कैलाश सिंह राजपूत ने सुझाव दिया कि देश के सभी पूजा स्थलों पर सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालय स्थापित किए जाएं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य जनहित के मुद्दों पर संवाद, व्याख्यान और विचार-विमर्श हो सके। उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, जबकि समाज और राष्ट्र के प्रश्नों पर खुली चर्चा आवश्यक है। इस अवसर पर उमाशंकर नागर ने वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़े फील्ड मार्शल मानेकशॉ और जनरल याह्या खान के रोचक प्रसंग सुनाए। वहीं मदनलाल जेठवा, सेवानिवृत्त प्राचार्य मानेकर, एस.एल. परमार, बाबूलाल वागड़े, प्रतिभा कुमार, चांद सोनी, राधेश्याम पांचाल, राजेश चौधरी और सुभाष व्यास ने प्रेमचंद के साहित्य और उनके विचारों पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। मालवी कवि विजय जोशी ने अपनी रचना "घास-फूस की झोपड़ी में सर्द ठिठुरती रात..." प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावुक कर दिया। मकसूद शाह ने हास्य-व्यंग्य से माहौल को हल्का किया। राधेश्याम पांचाल ने आत्मसंघर्ष पर आधारित अपनी रचना सुनाई, जबकि गोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ. इक़बाल मोदी ने अपनी शायरी प्रस्तुत की। चांद सोनी ने प्रेमचंद पर लिखी नज़्म का पाठ किया तथा प्रतिभा चंद्र ने अपनी मार्मिक रचना से सभी को भावविभोर कर दिया। इस्माइल नज़र ने ग़ज़ल सुनाई और राजेश चौधरी ने गीत प्रस्तुत किया। अन्य रचनाकारों ने भी प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम में मंजू, विनय, रचित सिसोदिया एवं भारतसिंह परमार सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। अंत में सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार कैलाश सिंह राजपूत ने व्यक्त किया।

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