सांस का अभ्यास करता उसका शरीर वज्र के समान बन जाता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली बालगढ़ चूना खदान पर गुरु शिष्य संवाद,, गुरुवाणी का आयोजन किया गया। सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने गुरु वाणी में कहा कि सर्वोदय विदेही विद्या है। इसक़ी थिंकिंग कंपन से समझा जाता है। जीव और स्वर क़ी देह नही है। दोनों विदेही है। जो चखने, सुनने में नहीं आता। इसको समझना पड़ता है गुरु शिष्य संवाद में। संवादों में ऐसे लोग भी मुझे मिले की कोई दम है क्या आपके पास। दम कहते हैं ओ गांजा पिने को। दम जबकि स्वास का नाम है। स्वास आपके अंदर है तो आप जिंदा है। उस स्वास के अंदर जो थिंकिंग है, कंपन है, जो वास्तविक चैतन्यता है वह विचारों की व्यवहारों क़ी सांस से हटकर है। कभी ऊंचे नीचे विचार आ गए तो सांस तेज चलने लग जाएगी। तो आपकी निज स्वास कौनसी है। निज स्वास और निज स्वरूप को लखत मिटे आस और भास, आसा बासा कल्पना सभी होय विनाश। हम निज स्वरूप तक पहुंच नहीं पाते। हम ऊपर से चमड़ा कपड़ा देखेंगे उसके व्यवहार देखेंगे। लेकिन जो आचार विचारों से रहित चर्चाएं है, वह संवादों से ही समझ में आएगी। शब्द अति झिणा बूझ विचारा जा से होय सकल निरवाणा। शब्द अती झिणा है। शब्दों को समझकर ही सदुपयोग करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि सदगुरु कबीर अविगत से चले आए जहां गति नहीं, कोई थिंकिंग नहीं। कोई भेद नहीं पाया आज तक। जहां गति शून्य हैं। जो हर वक्त वर्तमान है वहां मौजूद है। सतगुरु कबीर अपनी विचारधारा को व्यक्त करते हैं और गुरु शिष्य को अपने समान बनाकर समझाते हैं। तब निर्णय पर पहुंच पाओगे। तो गुरु अपने समान बना करके अपने विचारों को, व्यवहार को स्थिर करके और सत्य का पथ प्रकाश करते हैं। कपड़े चमड़े से रहित व्यवस्थाओं को देखो तो स्वयं का प्रकाश जो है वह सामने आएगा। जो आपका प्रकाश है सभी घटनाओं से रहित है। उसमें कोई घटना घटित नहीं होती है। वह अखंडित है। उसका कभी खंड नहीं होता। सांस का अभ्यास करता है उसका शरीर वज्र के समान बन जाता है। स्वास के सबसे पहले उपासक पवनसुत है। गुरु से लगन कठिन है मेरे भाई, गुरु कौन है समझने के लिए एकाग्र मन होना पड़ता है। मन की चालाकियां से दूर होना पड़ता है। तब जाकर गुरु शिष्य के अंदर यह निर्णय आता है कि यही सार और सत्य तत्व है। जो कभी बदलता नहीं। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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