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संसार में के सिंहासन पर बैठा हुआ है, जो अल्पायु है सांस को समझो सद्गुरु मंगल नाम साहेब,,सांस ही हरी है जिससे संसार जगत की सब देह चैतन्य है सद्गुरु मंगल नाम साहेब

संसार में के सिंहासन पर बैठा हुआ है, जो अल्पायु है सांस को समझो सद्गुरु मंगल नाम साहेब,,

सांस ही हरी है जिससे संसार जगत की सब देह चैतन्य है सद्गुरु मंगल नाम साहेब  

देवास। मैं भाव को समझो, कि मैं कौन हूं, मैं तेरे अंदर हूं, और तू मेरे अंदर है, मैं यह होता है। यह नहीं कि मैं अलग हूं और तू अलग है। इसलिए मैं याने स्वयं  को अपने अंदर ही  नहीं सबके अंदर देखें। सतगुरु ने कहा है, कि सतगुरु सकल भवन के वासी। भवन यानी शरीर। सतगुरु सभी शरीरों में निवास करते हैं। जितनी भी स्वास है उसमें सद्गुरु बैठा हुआ है। सांस ही हरि है, जिससे संसार की सब देह  चैतन्य है। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहब ने सदगुरु कबीर सरवर प्रार्थना स्थल चूना खदान बालगढ़ पर आयोजित गुरु शिष्य संवाद गुरुवाणी पाठ में व्यक्त किया। आगे कहा कि छोटे-मोटे ठर्री बाज लोग अहंकार में सांस रुपी हरि को भूले बैठे हैं। जो घड़ी दो घड़ी का अहंकार रूपी नशा है वह चढ़ता है और फिर उतर जाता है। ठर्रे बाजी छोड़कर सीधा बिना प्याले की स्वास से जुड़ों। अहंकार अभिमान में भाव को छोड़कर बिन प्याले कि सांस को पी जाओ। अहंकार अभिमान सब अल्पायु है। श्वास को जानो जो सारी देह को संभाले बैठा है। मैं का अहंकार ही दुख का कारण है। कि मैंने किया, यह मेरा है। सारा संसार में के सिंहासन पर बैठा हैं। मैं और तू की सीमा खड़ी कर लोग भटक रहे हैं संसार में। जिसका में भाव छूट जाता है वह एक दूसरे का दुख अपना दुख समझ लेता है। क्योंकि उस स्थिति में वह परिपूर्ण हो जाता है। फिर मुझमें और तुझमें उस एक ही चाहत को देख रहा है। कि सबको सुखी करना। कबीर साहब ने कहा कि जब में था तब हरि नहीं, अब मैं हूं हरी नाही। आज जिधर देखो हरि ही हरि है। अनंत हरि है । जिधर देखो उधर तू का तू,तेरे अंदर भी श्वास मेरे अंदर भी वही सांस बह रही है। सबको सुलभ सब दिन जैसा। कोई भी शहर हो कोई भी जगह, कोई भी दिन हो या रात सब जगह व्यापक रूप से उपलब्ध है। आगे कहा कि संयम नाम सदा चित् लाई जां से कॉल दगा मिट जाए। संयम नाम यदि अपना लिया तो सारे दुख से पार हो जाओगे। काल की चतुराई यही तो है, कि  उस में को भी दो कर दिया, कि तू और मैं। जबकि मैं हूं तो मैं और तू है तो तू ही है। दोनों को एक रंग में रंग दिया कि अब समझ में नहीं आता कि तू है कि मैं हूं। कबीर साहब कहते है कि अब हरि है मैं नाही। अब वह श्वास ही हरि रह गया है, ना मैं हूं ना तू है। इस दौरान सतगुरु मंगल नाम साहेब का साध संगत द्वारा नारियल भेंटकर पुष्प मालाओं से सम्मान कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।


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