न खाता न बही मेडिकल हे सही 😀😀😀
....महेश सोनी
हर ऑफिस की सुबह एक जैसी होती है।
"सर आज नहीं आए"
"कोई बात नहीं, थोड़ी देर रास्ता देख लेते हैं"
और 10 मिनट बाद व्हाट्सएप पर मैसेज आ जाता है - "मैं मेडिकल पर जा रहा हूं"।
न कोई हिसाब, न कोई बही। बस एक कागज का टुकड़ा और छुट्टी पक्की। इसे ही कहते हैं - *मेडिकल सर्टिफिकेट की महिमा*।
जब से विभाग बने हैं, तब से मेडिकल सर्टिफिकेट भी साथ चल रहा है। ये भारत की वो "आधुनिक सुविधा" है जो बीमार और स्वस्थ दोनों होने का प्रमाण एक साथ दे देती है।
*मेडिकल के कुछ प्रसिद्ध उपयोग:*
- *मकान बनवाना*: ईंट-सीमेंट के बीच में "तेज बुखार"
- *शादी-ब्याह*: "कमर में दर्द" के कारण 15 दिन का अवकाश
- *घर पर आराम*: "डॉक्टर ने बेड रेस्ट बताया है"
- *छुट्टी बची ही नहीं*: बाबूजी का तुरंत सुझाव - "आप मेडिकल लगा दो, सब ठीक हो जाएगा"
यदि एक महीने में शासकीय और अशासकीय विभागों में लगे सभी मेडिकल जोड़ दिए जाएं, तो शायद देश की असली स्वास्थ्य रिपोर्ट यहीं से बन जाए।
मेडिकल हर जगह है, बस बीमारी बदल जाती है:
*A. स्कूल वाला मेडिकल*
परीक्षा ड्यूटी, रिजल्ट बनाने का टाइम, या जब स्कूल में पुताई-रंगाई चल रही हो... तभी सर का मैसेज आता है - "गर्दन में दर्द है, 10 दिन का मेडिकल।"
और 11वें दिन सर बिल्कुल फिट होकर स्कूल फंक्शन में भाषण भी दे देते हैं।
*B. बैंक वाला मेडिकल*
महीने का आखिरी दिन, भीड़ ज्यादा, लोन के फॉर्म का ढेर... उसी दिन बाबू को "पेट दर्द" हो जाता है।
15 दिन बाद जब वो लौटते हैं तो कहते हैं - "डॉक्टर ने स्ट्रेस बताया था।"
*C. तहसील/कचहरी वाला मेडिकल*
किसी की जमीन की रजिस्ट्री अटकी है। बाबूजी 3 दिन से कुर्सी पर नहीं। पूछने पर पता चलता है "बैक पेन" का मेडिकल लगा है।
जैसे ही फाइल आगे बढ़ती है, दर्द भी अपने आप "ठीक" हो जाता है।
*D. हॉस्पिटल वाला मेडिकल*
ये सबसे मजेदार है। खुद नर्स और कंपाउंडर भी मेडिकल लगाकर घर बैठते हैं। एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर का मेडिकल बना देता है। यहां तो बीमारी भी मनपसंद मिलती है।
मेडिकल लेने की प्रक्रिया भी बड़ी सरल है।
डॉक्टर साहब बड़े प्यार से पूछते हैं - "कितने दिन का बना दूं? 10 दिन या 15 दिन?"
आप तारीख बताइए, बीमारी वो लिख देंगे।
और जब 15 दिन कम पड़ जाएं तो तरीका और भी आसान है - 15 दिन का मेडिकल लगाइए, एक दिन हाजिरी लगाकर फिर से नया मेडिकल ले लीजिए।
इससे ये सिद्ध हो गया कि *बीमार होना और स्वस्थ होना अब व्यक्ति के हाथ में है*। इतनी दिव्य शक्ति तो किसी युग में नहीं थी।
सबसे खतरनाक बात ये है कि ये "संक्रामक" है।
जब एक स्वस्थ कर्मचारी अपने साथियों को आराम से मेडिकल लगाकर छुट्टी मनाते देखता है, तो उसके मन में भी विचार आता है - "मैं क्यों पीछे रहूं?"
और बस, वो भी इस माया जाल में शामिल हो जाता है। धीरे-धीरे पूरे विभाग में मेडिकल का बोलबाला हो जाता है।
इसलिए कहा जा सकता है कि मेडिकल सर्टिफिकेट के हिसाब से सब बढ़िया चल रहा है... और आगे भी चलता रहेगा।
क्योंकि अंत में सच यही है -
*न खाता, न बही, मेडिकल है सही।*
महेश सोनी प्रधानाध्यापक(राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त शिक्षक एवं स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर नगर निगम) शासकीय माध्यमिक विद्यालय महाकाल कॉलोनी देवास

0 Comments