मप्र उर्दू अकादमी द्वारा "सिलसिला एवं तलाशे जौहर" के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ आयोजित,,
उर्दू शायरी में दिखी हिंदुस्तान की साझी संस्कृति, देवास में हुआ व्याख्यान व रचना पाठ
देवास।मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा, देवास के द्वारा सिलसिला एवं तलाशे जौहर के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन 23 अगस्त को वरिष्ठ नागरिक संस्था भवन, मल्हार स्मृति परिसर, देवास में में ज़िला समन्वयक मोईन ख़ान मोईन के सहयोग से किया गया। देवास में आयोजित सिलसिला के लिए मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने अपने संदेश में कहा कि “सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर” का उद्देश्य प्रदेश के ज़िलों में उर्दू भाषा एवं साहित्य की रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना और नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना है। उन्होंने कहा कि उर्दू साहित्य ने सदैव प्रेम, इंसानियत, भाईचारे और सामाजिक समरसता को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया है। ऐसे आयोजन साहित्यिक संवाद को सशक्त करने के साथ नई पीढ़ी को उर्दू साहित्य से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। " ज़िले के समन्वयक मोईन ख़ान मोईन ने बताया कि सिलसिला के तहत दोपहर 1:30 बजे व्याख्यान एवं रचनापाठ का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता विक्रम सिंह गोहिल ने की एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में फ़रीद ख़ान, गंगा सिंह सोलंकी, गुरमीत सिंह एवं प्रीत पाल सिंह मंच पर उपस्थित रहे। इस अवसर पर विक्रम सिंह गोहिल ने "उर्दू शायरी एवं साहित्य में सामाजिक समरसता" विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान की साझी संस्कृति को आकार देने और उसे जीवंत बनाए रखने में उर्दू का योगदान ऐतिहासिक है। विगत तीन शताब्दियों से उर्दू शायरी ने इस राष्ट्रीय व सांस्कृतिक दायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा से किया है। मीर-ओ-ग़ालिब की रूहानी विरासत से लेकर दाग़ और हसरत मोहानी तक, तथा मुंशी प्रेमचंद की रचनात्मक दृष्टि से लेकर जोश मलीहाबादी तक—इन सभी लेखकों ने एक समावेशी, समरस और साझे हिंदुस्तान के विचार को गढ़ा और सींचा है। उर्दू कभी संकीर्णता या कट्टरता की ज़बान नहीं रही; इसका मूल स्वर सदैव एकात्मता, बंधुत्व और सौहार्द का रहा है। विभाजन की भीषण त्रासदी के बावजूद यदि इस मुल्क का सामाजिक ताना-बाना और भावनात्मक एकता अक्षुण्ण रही, तो उसमें उर्दू की साझी विरासत की भूमिका अत्यंत केंद्रीय है। यह ऐतिहासिक सत्य विस्मृत नहीं किया जा सकता कि हमारी जंगे-आज़ादी को जिन इंक़लाबी नारों ने प्राणवायु दी, वे अधिकांशतः उर्दू ज़बान की ही देन थे।
रचना पाठ में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उनके नाम और अशआर निम्न हैं।
सोज़-ए-उल्फ़त हो अगर दोनों तरफ़ मद्धम सा
इश्क़ तब जा के कहीं दिल को मज़ा देता है
— अकबर देवासी
लबों पे प्यास मगर दिल समुंदरों जैसा
मिज़ाज पाया है हमने क़लंदरों जैसा
— अज़ीम देवासी
उनको मिटा दे ग़ारत कर दे या मौला
जो भारत में आग लगाते रहते हैं
— सलाहुद्दीन सलीस
क्या प्यास है मुईन की दरिया भी जान ले
साहिल पे छोड़ आया हूँ तश्नालबी का बोझ
— मोईन ख़ान मोईन
ऐसे रहती है मिरी माँ की दुआ साथ मिरे
जैसे मिट्टी किसी पौधे को बड़ा करती है
— गुलरेज़ अली
जब कोई भी कमी नहीं लगती
ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं लगती
— जय प्रकाश जय
ये भी हो सकता है कुछ देने को आया हो तुझे
दर न अपना बंद कर हाथों में कासा देख कर
— आरिफ़ वारसी
चूम कर फाँसी का फंदा जाँ-निसारों ने कहा
ऐ मिरे हिन्दोस्ताँ तेरी मोहब्बत मरहबा
— शादाब अशरफ़ी
ये इबादत रोज़ सुब्हो शाम होना चाहिए
दिल में तेरी याद लब पर जाम होना चाहिए
— चाँद सोनी
जीवन है समय के बहाव में
हर मानव है अब के तनाव में!
— डॉ. इकबाल मोदी
मुल्क पर जब भी कभी आँच अगर आए अदीब
अपनी जाँ दे के वतन अपना बचाया जाए
— अदीब राहिल
जुनून-ओ-ज़ोम की ज़द में कभी कभी इंसाँ
ख़ुद अपने हाथ से पगड़ी उछाल लेता है
— डॉ. शरीफ़ जमाल
इश्क़ एक तरफ़ा हो या हो बेवफ़ा महबूब
ज़ख़्म एक जैसे हैं दर्द कम ज़्यादा है
— राजेश राज
मोहब्बत से भरा गुलदान लिख दे
तिरंगे में है अपनी जान लिख दे
ज़रा सरहद पे तन्हा के लहू से
बहुत प्यारा है हिन्दुस्तान लिख दे
— ज़ुबैर तन्हा
इनके अलावा अंजुम देवासी, सुरेन्द्र सिंह राजपूत, अमर प्रीत सिंह खनूजा, देव निरंजन, मक़सूद शाह एवं साहिल सुलेमान ने भी अपना कलाम पेश किया ।कार्यक्रम का संचालन जय प्रकाश जय द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत ज़िला समन्वयक मोईन ख़ान मोईन ने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

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