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कला, साहित्य और संस्कृति पर सार्थक संवाद हुआ 'स्मरण अफ़ज़ल' में,,अफ़ज़ल की कला विश्वस्तरीय, उनकी चित्रकृतियाँ बेमिसाल,,बारिश के बावजूद इतने श्रोता उमड़े कि सभागार के बाहर खड़े होकर सुनना पड़ा।

कला, साहित्य और संस्कृति पर सार्थक संवाद हुआ 'स्मरण अफ़ज़ल' में,,

अफ़ज़ल की कला विश्वस्तरीय, उनकी चित्रकृतियाँ बेमिसाल,,

बारिश के बावजूद इतने श्रोता उमड़े कि सभागार के बाहर खड़े होकर सुनना पड़ा। 

देवास। विश्वस्तरीय चित्रकृतियों के मशहूर चित्रकार अफ़ज़ल को गुज़रे 26 साल से ज़्यादा हो गए लेकिन उनका देवास शहर से नेह का धागा ऐसा पक्का कि 'स्मरण-अफज़ल' में अपने लाड़ले कलाकार को याद करने बारिश के बावजूद इस शहर के बाशिंदे उमड़ पड़े। दो सौ से ज़्यादा लोग पहुँचे, सभागार छोटा पड़ा तो श्रोताओं ने बाहर खड़े-खड़े वक्ताओं को सुना। वनमाली सृजन केंद्रों के छठवें राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन देवास के प्रख्यात चित्रकार अफ़ज़ल की स्मृति में "स्मरण अफ़ज़ल" समारोह होटल श्री खेड़ापति इंटरनेशनल, देवास के सुसज्जित सभागार में किया गया। इस अवसर पर देश के प्रतिष्ठित चित्रकार, कला गुरु, कलावंतो एवं साहित्यकारों ने चित्रकार अफ़ज़ल के कृतित्व और भारतीय आधुनिक चित्रकला में उनके योगदान पर बात की। उनकी चित्रकृतियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन वनमाली सृजन पीठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्वरंग के निदेशक विश्वरंग एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ संतोष चौबे ने किया। प्रदर्शनी में अफ़ज़ल की चुनिंदा उत्कृष्ट कृतियाँ प्रदर्शित की गई। श्री चौबे ने कहा कि अफ़ज़ल भारत के उन चित्रकारों में शुमार हैं जिन्होंने पश्चिमी के प्रभाव को ढोया नहीं, आत्मसात किया, वैश्विक दृष्टि बनाई और अपनी चित्रकृतियों में एक इतिहास रच दिया। पूरा प्रदेश जब उन्हें देवास के एक साधारण चित्रकार के रूप में देखने और धीरे धीरे भुलाने लगा था, तब रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और विश्वरंग ने अशोक भौमिक जी की मदद से उन्हें नए संदर्भों में पुनः वैश्विक मंच पर स्थापित किया और आधुनिक कला में जो भारतीय कलाकार निरंतर हाशिए पर धकेले जा रहे हैं, उनकी पुनर्प्रतिष्ठा संभव हो सकी। उन पर हिन्दी में एक मोनोग्राफ़ प्रकाशित कर दुनिया के सामने रखा। इस कड़ी में कई चित्रकारों पर ऐसे मोनोग्राफ़ प्रकाशित हुए हैं।विश्वरंग के ज़रिए दृश्यकला में चित्र प्रदर्शनियों, सेमिनारों, कार्यशालाओ , कला चर्चा के माध्यम से एक सृजनात्मक माहौल बनाया है जो भारत के सांस्कृतिक एवं समावेशी विकास के लिए अत्यंत जरूरी है।  उन्होंने देवास के कलाकारों, लेखकों, लोक गायकों की माँग पर देवास शहर में प्रतिवर्ष तीन दिवसीय आयोजन के माध्यम से हम निरंतर कला, लोक संगीत और साहित्य की गतिविधियों को जारी रखेंगे। महावीर वर्मा द्वारा लिखित और रबिंद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय से प्रकाशित अफ़ज़ल के मोनोग्राफ़ का विमोचन भी हुआ।  आधार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ चित्रकार एवं कला समीक्षक अशोक भौमिक ने कहा कि अफ़ज़ल ने जिस निष्ठा से चित्रकला की साधना की वह हम सबके लिए प्रेरणा है। पोट्रेट, लैंडस्केप, कंपोजिशन आदि सभी प्रकार से काम किया और उन्होंने एनामेल पेंट की सहायता से अपनी एक मौलिक शैली विकसित की। यहां उन्होंने कला के आधारभूत तत्वों को आधार मानकर, वैश्विक कला दृष्टि को अपनाकर भारतीय आधुनिक चित्रकला में एक बड़ी सृजनात्मक लकीर खींच दी। देवास जैसे छोटे शहर में रहते उन्होंने कला जगत में खींची गई तमाम नकारात्मक लकीरों को अपने रंगों और केनवास की हमजोली से मिटाया भी है। अफ़ज़ल के चित्रों का विश्लेषण हमें भारतीय चित्रकला के इतिहास की अहमियत को आत्मसात करने की दृष्टि देता है। वे भारत के मौलिक, आधुनिक और अमूर्त चित्रकला के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं।अफ़ज़ल सिर्फ़ देवास के नहीं वे भारत के महान चित्रकारों में शुमार है। कला समीक्षक एवं लेखक जयपुर के डॉ राजेश शुक्ल ने अफ़ज़ल की कृतियों को सांस्कृतिक व रूहानी दस्तावेज बताया और कहा कि जिस तरह उन्होंने चित्रकृतियों में कलात्मक प्रयोग किए वे उनकी प्रखर चेतना का प्रमाण है। अफ़ज़ल जी की कलाकृतियों को देखते हुए उनकी कला के अमरत्व को ग्रहण करना होता है। हम सौंदर्य को शास्त्रों में खोजते है जबकि वह को हमारी कलाओं में निहित है। अफ़ज़ल जैसे अमूर्तन के चितेरे के चित्रों में वह निहित है। अमूर्तन पूर्ण रूप से भारतीय शिल्प और स्थापत्य का प्रमुख आधार है। अफ़ज़ल के चित्रों में दृश्य से अधिक अदृश्य की मौजूदगी होती है। अफ़ज़ल परतों के बाहर के चित्रकार थे, वे कुछ भी छुपाते नहीं थे। वरिष्ठ कथाकार प्रकाश कान्त ने कहा कि अफ़ज़ल महज एक चित्रकार नहीं थे उन्होंने अपनी कला से तो हमें प्रेरित किया ही बल्कि अपनी सादगी और स्पष्ट जीवन दृष्टि से भी प्रभावित किया। अफ़ज़ल जी के चित्रों में देवास की माटी की सौंधी महक देश-दुनिया तक अपना दायरा बनाती है। इससे पहले शुभारंभ अवसर पर सुप्रसिद्ध लोकगायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपाणिया एवं उनके साथियों ने निर्गुण भजनों की सशक्त प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कबीर को सुनते हुए संगीत और दर्शन का अद्भुत संगम देखने को मिला। लोक शैली में प्रेम और सद्भाव का संदेश देते हुए मंगल गीत "आवो आवोरी सहेली उनका मंगल गावाँ हो री" "बिन गुरु ज्ञान न पाया, फोकट जमन गवाया, यू हीं जनम गवाया", "कहाँ से आया कहाँ जाओगे खबर करों अपने घट की", तथा "जरा हल्के गाड़ी हाको मेरे राम गाड़ी वाले,
जरा धीरे धीरे गाड़ी हाको मेरे राम गाड़ी वाले..." जैसे लोकप्रिय कबीर भजनों की।प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन देवास के महत्वपूर्ण कथाकार मनीष वैद्य ने किया। स्वागत वक्तव्य कृपाली राणा और अतिथियों का परिचय मनीष शर्मा ने दिया।धन्यवाद ज्ञापन डॉ अर्जुन कुमार सिंह, संयोजक टैगोर कला केंद्र, विभागाध्यक्ष - टैगोर स्कूल ऑफ फाइन एंड परफार्मिंग आर्ट, भोपाल ने किया।
देवास शहर के गणमान्य जन, कलाप्रेमी और साहित्यकार बड़ी संख्या में उपस्थित थे। स्वागत मनोज राजानी, रणजीत सिंह राठौर, मक़सूद अली आदि ने किया। अफ़ज़ल के परिवार की ओर से शरीफ़ खान ने कृतज्ञता ज्ञापित की। इस अवसर पर आमंत्रित रचनाकारों का कवितापाठ चयन कानूनगो के संयोजन में आयोजित किया गया। इसमें रुद्राक्ष शर्मा ने 'छत', उर्वशी उपाध्याय ने 'एक गठरी सपनों की', दारा सिंह ने 'उड़ान', आरती गोस्वामी ने 'प्रकृति', कविता नागर ने 'कच्चा रास्ता', कुसुम वागड़े ने 'साथ', शांतनु बहेरे ने 'हौसला', अर्पणा जैन ने 'छुईमुई', पायल कानूनगो ने 'रंगों के नियम', हिमांशु कुमावत ने 'मरहम', सुमन कुमावत ने 'मेरी हँसी की भाषा', संदीप भटनागर ने 'अर्थ, रश्मि शर्मा ने 'हाँ', कृपाली राणा ने 'बगावत', मंजू जैन ने 'बायपास',अमेय कांत ने 'छुटी हुई जगह',मनीष शर्मा ने 'दरवाज़ा', संजय सिंह राठौर ने 'बोनसाई', विनय उपाध्याय ने डायरी' डॉ. राजेश व्यास ने 'तिक्षरक्षिता' शीर्षक से अपनी रचनाओं का उम्दा पाठ किया। संतोष चौबे जी ने आदिवासियों, रज्जू भय्या बाँसुरी बजाते थे, बालकनी में प्रीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, छोड़ो यार कविता का यादगार पाठ किया। मंच पर अशोक भौमिक एवं प्रकाश कांत उपस्थित रहे।
आभार सुमन कुमावत ने माना।


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