यदि सुधारने के लिए अपमान करना पड़े, तो आप सिखाने की कला नहीं जानते,,सोनी
संसार में सुधार की जरूरत हमेशा बनी रहती है। सुधार करने के लिए कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं। जब हम किसी व्यक्ति में सुधार लाने की कोशिश करते हैं तो उसके लिए हम कठोर बर्ताव करते हैं और परिणाम स्वरुप वह व्यक्ति सुधारने के बजाय विरोधी हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि हम सुधार करने का प्रयास ही बंद कर दें सुधार करने के लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि सुधार इस प्रकार किया जाए कि उसे अपमानित भी नहीं होना पड़े और उसमें सुधार हो जाए।
एक रिटायर्ड टीचर के पास एक नव युवक जाता है और प्रणाम करता है। वह पूछता है सर आपने मुझे पहचाना ।सर कहते हैं नहीं। नवयुवक कहता है मुझे आपने सुधार की जो राह दिखाई थी आज मैं उस पर चलते हुए प्रशासनिक अधिकारी बन गया हूं। नव युवक कहता है कि जब मैं 8 वी कक्षा का छात्र था और आप हमारी क्लास के अध्यापक थे।एक दिन मैंने एक बच्चे का पेन चोरी कर लिया था। जब आपने पूरी क्लास से पूछा और कोई उत्तर नहीं मिला तो आपने बंद कमरे में सब की तलाशी ली थी लेकिन आपने सभी बच्चों को आंख बंद करने के लिए कहा था। आपने मेरी जेब में हाथ डालकर वह पेन निकाल लिया और पेन मिलने के बाद भी आगे अपने तलाशी जारी रखी और जब सब बच्चों की तलाशी हो गई तो आपने कहा देखिए यह पेन मिल गया और पेन जिसका था उस को वापस कर दिया। इस घटना ने मेरा मन परिवर्तित कर दिया था।
उसके बाद मैं मन लगाकर पढ़ाई की और आज प्रशासनिक अधिकारी बन गया। यह सब आपके सुधार का ही परिणाम है। सर मुस्कुराए और बोले हां मुझे वह घटना तो याद है लेकिन मुझे नहीं मालूम कि वह छात्र तुम थे क्योंकि उस दिन मैंने भी तलाशी लेते समय अपनी आंख बंद कर ली थी इसलिए मुझे भी नहीं मालूम था कि किस बच्चे की जेब से पेन निकला था।
नवयुवक बोला उस दिन आपने मुझे शर्मिंदा नहीं किया। न ही आपने कभी इस बारे में बात की, न मुझे अलग से बुलाकर कुछ कहा।
उस दिन से मेरी ज़िंदगी बदल गई। मैंने निश्चय किया कि मैं कभी गलत रास्ते पर नहीं जाऊँगा।
आपने मुझे सही राह दिखाई। "यही सच्ची शिक्षा का सार है—
*यदि सुधारने के लिए अपमान करना पड़े, तो आप सिखाने की कला नहीं जानते।"*
महेश सोनी प्रधानाध्यापक ( राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त शिक्षक एवं स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर नगर निगम) शासकीय माध्यमिक विद्यालय महाकाल कॉलोनीदेवास

0 Comments