साधु वही है, जो साधकर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। साधु का धर्म है साधना, ना कोई बुरा है, ना कोई भला। अपने को कोई मुसीबत आई उसे साध कर पार कर लेना। रास्ता कहीं आया है, अपने को कहीं जाना, सुख पाना है। तो फिर साधना का मार्ग खोजना है। यह विचार सदगुरु कबीर साहुहारा प्रार्थना स्थल मंगलवार का टेकरी द्वारा आयोजित गुरुवाणी पाठ गुरु शिष्य संवाद में सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने व्यक्त किए । उन्होंने आगे कहा की हमारी धारणा ध्यान और समाधि है की हम क्या चाहते हैं, उसको खोजता है, वह साधु है। और वही साधना है। संसार के दुख सुख को समझने के लिए ही तो संत होते हैं। खोजने वाला विज्ञान को भी एक संत कहा गया है। किसी तत्व को जानकर उसका सदुपयोग किया। आवश्यकता ही विज्ञान की जननी है। आवश्यकता हमको लगी है। भूख लगी है तो विकास करेंगे।उसे खोजेंगे। खोजने वाले का नाम जिज्ञासु है, ज्ञानी नही। ज्ञानी और साधु वही है जो साधकर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।उसका नाम ही साधु है। सिर्फ दाढ़ी, जटा बढ़ाने और वेशभूषा से कोई साधु और ज्ञानी नहीं हो जाता। साधु वही है जो साध लेता है। ज्ञानी आदमी परमात्मा को नहीं खोजता। जो जिज्ञासु होता है वही परमात्मा को खोजता है। ज्ञानी होने के बाद वह नहीं कह सकता। सब जान गए तब मालूम पड़ा परमात्मा का भेद। बाकी सब यात्राएं भटकाव है, आदमी को दिखता कहां से हैं, आँख से। लेकिन उजाला ना हो तो आँख कैसे देख पाएगी। यदि आंख भी है, उजाला भी है और वस्तु भी है तभी वह देख पाएगी। आगे कहा कि जिसने जैसा बता दिया कि परमात्मा कहां है। चल पड़े। कोई गांजा भांग पीकर भी मन को लगा रहे हैं। यह सब खोजने की तरकीब है। कोई दया करके ढूंढ रहा है,तो कोई क्रोध करके। यह सब साधुता में आते हैं। इसलिए इनको कर्म माफ है। सब झूठ में भटक रहे हैं। झूठ की छाया होती है क्या। चाहे कितनी भी खोज कर लो अंधेरे की जड़ नहीं मिलती है। क्योंकि होती ही नहीं है। सद्गुरु के संवाद से अपने अंतर घट के अंदर ही परमात्मा की अनुभूति होगी। बाकी सब भ्र्म और भटकाव है। इस दौरान साध संगत सेवक ईश्वर लाल, जीवा साहेब, मिर्ची बाबा आदि ने सद्गुरु मंगल नाम साहेब को नारियल भेंट कर व पुष्पाल पहनकर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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