श्वास ही चैतन्यता का सार है, सांस जीस शरीर को छोड़ देती है वह अपवित्र हो जाता है...सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। उठा दे सारे दुनिया के तूफान जो दिल में तूने बिठा रखे हैं। स्वयं को आने दे जो तेरा सुख का सागर है। सांस ही सत्य है, जो नाक में निवास करती है। जो सारे संसार की चैतन्यता का सार है। सांस जिस शरीर को छोड़ देती है,,वह अपवित्र हो जाता है। वह अचेतन में चला जाता है। श्वास निर्बेर है जो सब में समान रूप से बह रही है। कभी सोती नहीं सदैव जागृत रहती हैं। सांस की ही उपासना करो साधना करो। उसी में सब 33 करोड़ देवी देवता जो तुम्हारे रोम रोम की कल्पना है जो 88 करोड़ घाट हैं इन सब को पार करने वाला सांस ही है। सांस है तो तुम्हारी प्रतिष्ठा मान्यता है। सांस नहीं तो सब मिथ्या हो जाता है। इसलिए स्वयं को और श्वास को जानो, समझो। जो सारे सुखों का सागर है। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली सेवा समिति मंगल मार्ग टेकरी द्वारा आयोजित गुरु वाणी पाठ, गुरु शिष्य संवाद के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि श्वास की उपासना करता है उसका अंग वज्र अंग हो जाता है, वज्र के समान हो जाता है। फिर दुनिया भर के कोई भी अस्त्र-शास्त्र उसे छू नहीं सकते। अंग वज्र के समान हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि जैसे मछली पानी से प्रेम करती हैं उसके बिना नहीं रह सकती हैं। पानी के बिना जी नहीं सकती। वैसे ही अमि तत्व है श्वास। जो एक सूखी नदी है जिसमें पांचो तत्व, अमि तत्व बह रहा है। अमीन नाम प्रेम है। ऐसा ही अमि तत्व के बिना सांस नहीं रह सकती। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में ही सारी चीज समाई हुई है लेकिन लोग भूत और भविष्य की कल्पनाओं चिताओं में भटक रहे हैं। इस दौरान साध संगत द्वारा सद्गुरु मंगल नाम साहेब को नारियल भेंट कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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