ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश आता है, तो शत्रुता का नाश हो जाता है... सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशां. ह्रदय में ज़ब ज्ञान का प्रकाश आता है तो शत्रुता का नाश हो जाता है। की जैसा तू है वैसा मैं भी हूं। प्राणमय आप और प्राणमय मैं हूं। शरीर की रचना कपड़े चमड़े में नहीं। व्यावहारिकता में नहीं है। प्राणमय है। प्राण ही सब देह का मूल आधार है। इसलिए एक दूसरे को हम प्रणाम करते हैं। प्राण में आपका रहना है प्राण में मेरा रहना है। प्राण विदेही पुरुष है। जो तत्व गुण से रहित है। इसलिए प्रणाम किया जाता है कि मैं और तू कुछ भी नहीं है सब प्राणमय है। विदेही पुरुष में सब समाए हुए है। जितनी भी देह सब विदेही स्वाँस के ऊपर टिकी हुई है। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली सेवा समिति मंगल मार्ग द्वारा आयोजित चौका आरती, गुरुवाणी पाठ, गुरु शिष्य संवाद के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि प्रेम प्यार संतों ने सिखाया है। प्राण की उपासना, साधना करके कई संत मुनियों ने शरीर को वज्रअंग बनाया है। सांस की उपासना करके शरीर को सब साधनमय युक्त बनाया है। वैराग्य त्याग और विज्ञान तीन चरण है। ज्ञान हो गया तो उस ज्ञान के बाद वैराग्य हो जाना चाहिए। अभिमान नहीं होना चाहिए कि मैं ज्ञानी हूं। हो जाता है इसलिए हृदय के प्रकाश को प्रणाम करते हैं। यह संतों की देन है। तीर तलवार तोप से संसार की समस्या हल नहीं होगी। प्रेम प्यार से संसार की समस्या हल होगी।। इसलिए हम प्राणमय प्रणाम करते हैं। कोई राम-राम कहता है कोई और कुछ उच्चारण कर संबोधन करता है। शरीर के किसी भी अंग का अभिमान अहंकार है वह एक सीमा तक है। हमेशा नहीं रहता। शरीर में कोई भी अंग आपका नहीं होगा तो चलेगा। लेकिन अगर स्वाँस नहीं रही तो निधन हो जाता है। विदेही अंग के होने के करण हम सब प्रणाम करते हैं। कि वह सबसे साक्षात सत्य है जिसकी देह नहीं है। वह सबमें समाया हुआ है। इसके बिना एक पल भी नहीं जी सकते। जिसकी देह नहीं है वह सब अंग में समाया हैं। इस दौरान सद्गुरु मंगल नाम साहेब, नितिन साहेब, नीरज साहेब को सध संगत द्वारा नारियल भेंट कर व आरती कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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