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जो खाया जाता है वो हमारा नहीं, जो पचाया जाता है वो हमारा है,,- श्री विश्वकर्मा मंदिर महावीर नगर में इंद्रजीतसिंह नागर द्वारा अमृतवाणी सत्संग कीर्तन हुआ

जो खाया जाता है वो हमारा नहीं, जो पचाया जाता है वो हमारा है,,
श्री विश्वकर्मा मंदिर महावीर नगर में इंद्रजीतसिंह नागर द्वारा अमृतवाणी सत्संग कीर्तन हुआ
देवास। जो खाया जाता है वो हमारा नहीं, जो पचाया जाता है वो हमारा है। जो सुना जाता है वो हमारा नहीं, जो उतारा जाता है वो हमारा है। राष्ट्र बचेगा तो हम बचेंगे। राष्ट्र सर्वोपरि है। जो राष्ट्रद्रोही है, उससे बड़ा पापी कोई नहीं। मुझे प्रसन्नता हुई जब पीडी शर्मा जी, राधेश्याम पांचाल ने विश्वकर्मा वंश समाज को एक करने का काम कर रहे हैं। यह संकल्प सर्व विश्वकर्मा वंशज ने लिया है, इसके लिए श्री शर्मा, राधेश्याम जी जैसे अग्रणी लोग साधुवाद के पात्र हैं।
यह बात श्री विश्वकर्मा मंदिर महावीर नगर में मधुसूदन नागर के श्रीमुख से चल रही सात दिवसीय संगीतमयी भक्त माल की कथा के अंतिम दिन इंद्रजीतसिंह नागर ने अमृतवाणी सत्संग कीर्तन में कही। उन्होंने कहा जहाँ स्वयं प्रभु विराजमान हों वहाँ हमारा आचरण कैसा हो, यह सोचना चाहिए। ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि परमात्मा को उन्होंने चाहा और उन्हें वह मिला। इसके लिए अलग ही स्तर की भक्ति करना पड़ती है। उन्होंने कहा आपके 1 मित्र हों या फिर 100 लेकिन उनमें से एक सत्संगी होना चाहिए। क्योंकि वही आपको मलिनताओं से बचा सकता है। दो घंटे तक चले अमृतवाणी सत्संग में श्री नागर ने परिवार को, समाज को, राष्ट्र को मजबूत करने के लिए सत्संग का मार्ग अपनाने की अपील की। इस अवसर पर देवास की लता मंगेशकर श्रीमती नमिता शिरके के दिव्यता भरे भजनों ने वातावरण को भक्तमयी कर दिया। अंत में श्री नागर का स्वागत अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासंघ प्रदेश सभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष प्रभुदयाल बरनेला, सर्वश्री विश्वकर्मा वंशज अध्यक्ष पीडी शर्मा, कोषाध्यक्ष राधेश्याम शर्मा, मंदिर प्रबंधन समिति अध्यक्ष राकेश शर्मा आदि ने किया। 
हवन, पूजन और पोथी पूजन के साथ पूर्णाहुति
         अमृतवाणी सत्संग से पूर्व सुबह सभी यजमानों की विशेष उपस्थिति में हवन, पूजन हुआ। मंत्रोच्चार के साथ हवन कुंड में आहुतियां डाली। इसके बाद मधुसूदन नागर ने भक्त माल की कथा सुनाते हुए कहा कि हमारे देश में इतने भक्त हुए हैं कि उनकी कथा 7 दिनों में पूर्ण नहीं हो सकती। उसके लिए तो महीनों लग जाएंगे लेकिन व्यक्तित्व और कृतित्व खत्म नहीं होंगे। उन्होंने पूरे मनोभाव से सत्संग में जाने, संतों और परिवार के वरिष्ठों की सेवा करने के आव्हान के साथ अपनी वाणी को विराम दिया।

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