सत्य जीव है जो गुरु शिष्य संवाद के उजियारे में ही समझा जा सकता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। गुरु का शब्द चुंबक की तरह है, जो अपने अंश को अपने शिष्यों और सत्कर्म करने वालों को जल्दी प्रभाव में लेकर बोध करा देता है। गुरु देह को चुंबक की तरह उदित कर देता है। गुरुत्वाकर्षण वैचारिक व संवादी बल है। जीव जब संवाद का बल प्राप्त करता है तो गुरु अपने अंश को खींच लेता है, जिस प्रकार किसान फसल का दाना निकाल कर छोते को फेंक देता है।
यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली सेवा समिति मंगल मार्ग टेकरी द्वारा आयोजित गुरु शिष्य संवाद, गुरुवाणी पाठ में व्यक्त किए। कहा, कि सद्गुरु संवाद और शब्द का उजियारा देकर जीव को अपना बना लेते हैं। संवाद का उजियारा चेतन है। संवाद के उजियारे में आए कि आप चेतना में प्रवेश कर जाते हो। जो दया, भाव, सत्य प्रेम में खड़ा है, उसे ही सद्गुरु अपनाते हैं। जिस तरह से हम पानी को छानकर साफ कर लेते हैं, उसी प्रकार गुरु शब्द को छान करके उसका सदुपयोग करते हैं। लेकिन लोग वाणी को ही शब्द समझ बैठते हैं। जबकि वाणी और शब्द में बहुत अंतर है। ना समझी के कारण लोग भटक मरते हैं। वाणी अपने-अपने मतलब कि लोगों के पास है। जबकि शब्द अखंड है और निर्बेर है। जो बिना होंठ और कंठ से बोला जाता है। होंठ कंठ व जीभ की जरूरत नहीं पड़ती और वह सांस है। आगे कहा शब्द के भीतर ही भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है। शब्दों को समझ कर ही उसका सदुपयोग करना चाहिए। साहब कहते है देह की अनेकता में एकता दर्शाकर प्रतिदेह को साढे तीन हाथ का संदेश दिया है। कोई भी मनुष्य देह 3:30 हाथ से ज्यादा की नहीं होती है। सब अपने-अपने हाथ से नाप लीजिए। गुरु शिष्य संवाद की पूर्णता को प्राप्त कर लेता है वह भव बंधन से मुक्त हो जाता है। शब्द अबोल हैं जो नासिका के छीद्र से वाणी विचारों से अनंत तरह से प्रकट हो जाता है। जैसे विदेही जीव 84 लाख योनियों के 88 करोड़ घाट में प्रवाहित होने वाली देह को सुरु गुरु अपनी डोर को पकडा कर पार कर देता है। सत्य जीव ही है, जो गुरु शिष्य संवादों के उजियारे में ही समझा जा सकता है।वही प्रमाणिक हंस कहलाता है। इस दौरान साध संगत द्वारा सद्गुरु मंगल नाम साहेब को नारियल भेंट कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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