अपने अंदर के अहंकार रूपी रावण को जलाएं ... सद्गुरु मंगल नाम साहेब
देवास। पहले अपने अंदर के अहंकार रूपी रावण को जलाएं।कितने ही रावण अब तक जलाऐ जा चुके हैं। अगर इतने रावण होते तो आज दुनिया हिल जाती। दशहरा यानी 10 इंद्रियां हैं हमारे अंदर पांच ज्ञान और पांच कर्म इंद्रियां हैं। इन दसों इंद्रियों को हेरो, परखों की कौन सी इंद्री से क्या बोध हो रहा है, इनको समझो। जैसे प्रकाश के अभाव में अंधेरे का अस्तित्व है। अगर प्रकाश है तो अंधेरा का क्या अस्तित्व है। वैसे ही हमारे अंदर अज्ञानता अहंकार का अंधकार तभी तक है, जब तक कि हमें इंद्रियों का बोध नहीं होगा। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहैब ने बालगढ़ चूना खदान स्थित सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली पर विजयादशमी पर ध्वजारोहण कार्यक्रम एवं गुरु शिष्य संवाद, गुरुवाणी पाठ के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि जब सद्गुरु की शरण में जाएंगे तभी इंद्रियों को परखने की समझ विकसित होगी। हम बार-बार रावण को जला रहे हैं, भरोसा ही नहीं हो रहा है कि अपने अवगुण मिटे कि नहीं। अपने अवगुणों को मिटाते नहीं और दूसरों के अवगुणों को ढूंढ रहे हैं। अपने अवगुणों को ढूंढो और उन्हें मिटाओ। घर अपना जलाओगे तभी ज्ञान होगा। दूसरों का घर जलाने पर हमें ज्ञान नहीं होगा। फिर भी घर कायम ही रहेगा। रावण हमारे अंदर ही बैठा हुआ है उस अहंकार रूपी रावण को जलाते नहीं और बार-बार रावण को जलाने में लगे हैं।आगे कहा कि अपनी ज्ञान और कर्म इंद्रियों को सुधारो और संयम रखो। रावण इतना संयमित था कि 6 करोड़ वर्ष तक जिया और तुम तो आज ही संयम खो बैठे हो। पहले अपनी करनी को सुधारो अपनी करनी को सुधारते नहीं और दूसरों की करनी में कमि ढूंढने में लगे हुए हो। अपनी करनी सुधारलो तो समझो रावण मर गया. जब तक अपनी करनी नहीं सुधारोगे तब तक तुम्हारे अंदर बैठा हुआ रावण, तुम्हें सद मार्ग पर नहीं जाने देगा। सद्गुरु की संगति और उनके वाणी विचारों पर चलकर ही हमारे अंदर बैठा हुआ रावण मरेगा। फिर हमें बाहरी रावण को नहीं जलाना पड़ेगा। इस दौरान सतगुरु मंगलम साहब का साथ संगत में पुष्प मालव से सम्मान कर नारियल भेंट किए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

0 Comments